तेल का खेल: लेकिन लड़ाई इससे कहीं बढ़कर है

नए साल की दस्तक एक अभूतपूर्व घटना के साथ हुई। दुनिया को नियम आधारित और लोकतांत्रिक व्यवस्था का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के तहत एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को अगवा कर लिया! और उन्हें न्यूयॉर्क शहर ले गए, जहां उन्हें 'नारको आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कानूनी कार्रवाई' का सामना करना पड़ा। यहां बात वेनेजुएला की हो रही है।

अमेरिका की इस कार्रवाई से निराश विदेशी मामलों के जानकारों के मुताबिक,

यदि यह करना जरूरी भी था तो वैधानिक विकल्पों का सहारा लेकर किया जाता, जिसमें अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी न होती। मसलन मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाता और उसके चार्टर अनुरूप कार्यवाही होती। यूएस कांग्रेस से अनुमति ली जाती। लेकिन यह सब हुआ...और लगभग सभी मुल्क चुप्पी साधे रहे। प्रतीकात्मक विरोध तो दिखा लेकिन प्रतिकार के स्वर की कमी साफ दिखाई दी।

ट्रंप जो दुनिया के विभिन्न देशों के बीच युद्ध रुकवाने का दावा करते नहीं थकते थे और खुद को शांति के नोबेल पुरस्कार का दावेदार घोषित कर चुके थे ! ऐसे में अमेरिका की इस कार्रवाई को दोहरा मानदंड नहीं तो और क्या कहा जाएगा।

आखिर इसकी वजह भी तो हैं... यह रूपरेखा तो बड़बोले ट्रंप ने अपने चुनावी कैंपेन में पहले ही तैयार कर दी थी कि वे दुनियाभर में चल रहे युद्धों को रोक देंगे और मागा पर काम करेंगे...मागा माने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन। ट्रंप जलवायु परिवर्तन, महिलाओं के मुद्दे पर आलोचक रहे हैं, इन्हें वह डिस्कोर्स का सब्जेक्ट ही नहीं मानते। ट्रंप का यह कदम नव साम्राज्यवाद को फिर से परिभाषित कर रहा है...जहां नियम कानून को ताक पर रख शक्ति के पैमाने पर हितों को साधने और दुनिया को चलाने की कोशिश है। इस कड़ी का अगला हिस्सा कौन बनता है बस इसे देखते रहिए।

मादुरो को नियमों की अनदेखी कर उठाए जाने को तरह-तरह से देखा जा रहा है... सामरिक विश्लेषकों का कहना है कि यह लड़ाई तेल और रेयर अर्थ मेटेरियल और पश्चिमी गोलार्द्ध में कम हो रहे अमेरिकी प्रभाव को पुनर्परिभाषित करने के लिए है। जो हो भी मुझे लगता है कि यह लड़ाई तेल से कहीं बढ़कर है...क्योंकि भविष्य की ऊर्जा और शक्ति का साधन तेल नहीं...रेयर अर्थ मेटेरियल, उनकी जटिल प्रोसेसिंग, तकनीक, एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, न्यूक्लियर एनर्जी जैसे क्षेत्र और सामरिक प्रभाव है। जिसका इन पर कब्जा होगा वह नए वर्ल्ड ऑर्डर का नेतृत्व करेगा। लेकिन कुछ वजहें घरेलू भी हैं जिन पर ट्रंप बुरी तरह घिर गए हैं, वेनेजुएला उससे बाहर निकलने का एक सॉफ्ट टारगेट भर है।

ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग

वेनेजुएला पर हमले एक और बड़ा घरेलू राजनीतिक कारण भी है- असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना। यह भी इतना जाना-पहचाना है कि हंसी आती है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह पहला साल है। पहले साल में ही उनकी अप्रूवल रेटिंग 36-41 फीसदी तक रह गई है जबकि डिस्प्रूवल 58 से 62 फीसदी तक पहुंच गई है। एपस्टीन फाइल के राज धीरे-धीरे खुल रहे हैं। मागा समर्थकों में झगड़े बढ़ रहे हैं। टूटन शुरू हो चुकी है। राजनीतिक मुश्किलें बढ़ रही हैं। इस साल अमेरिकी संसद-हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट के मिड टर्म चुनाव भी हैं। ऐसे में माहौल बदलना और ध्यान भटकाना जरूरी हो गया था और वेनेजुएला वह सॉफ्ट टारगेट था । यह नया नहीं है बिल क्लिंटन ने मोनिका स्कैंडल से ध्यान हटाने के लिए सूडान में मिसाइल हमले कराए थे। कहने का मतलब वेनेजुएला बस बहाना है।

विस्तार करो और मुनाफा कमाओ

नियम आधारित विश्व व्यवस्था का मूल उद्देश्य संप्रभुता का सम्मान, क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन जैसी प्रमुख बातें थीं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं-संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, विश्व व्यापार संगठन और बहुपक्षीय संधियां इसी व्यवस्था का मजबूत आधार थीं। लेकिन आज स्थिति यह है कि नियमों का पालन केवल तब किया जाता है, जब वे शक्तिशाली देशों के हितों के अनुकूल हों।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कर्ज तले दबे देशों से महान बने अमेरिका ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए वह सब किया जो प्राचीन समय में बर्बर क़बीलाई लोग करते थे। वे सीधे हिंसक तरीके अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार करते थे तो ये वैश्विक मंचों और अपनी मजबूत लॉबी का सहारा लेकर। गौर करने वाली बात है ट्रंप के मागा का एक साल पहले नारा था- अब और युद्ध नहीं, जबकि आज नारा है- हमला और विस्तार करो, मुनाफा कमाओ।

नियमों का उल्लंघन

इस बात पर काफी बहस चल रही है कि क्या अमेरिका का यह या अन्य हस्तक्षेप उचित था। अमेरिका का दावा है कि उसके हस्तक्षेपों का उद्देश्य उसके सुरक्षा हितों, निवेशों, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा करना और विकास को बढ़ावा देना है। अमेरिका ने क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में संतुलन बनाए रखने का तर्क भी दिया है। वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप उचित है या नहीं, यह प्रश्न अत्यंत सैद्धांतिक और विवादास्पद भी है।

हस्तक्षेप का अर्थ है किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देना। चूंकि वेनेजुएला एक संप्रभु राज्य है, इसलिए किसी अन्य संप्रभु राज्य के आंतरिक मामलों में अमेरिका का हस्तक्षेप अतिक्रमण है और कानूनी रूप से इसकी कोई वैधता नहीं है।

अमेरिका की चिंताएं जायज हो सकती हैं लेकिन इस्तेमाल किया गया तरीका पूरी तरह से अवैध व गैर-जिम्मेदाराना है। ट्रंप हमले को निकोलस मादुरो के निरंकुश शासन का हवाला देते हैं, जिसके कारण कई वेनेजुएलावासी अमेरिका में शरण लेने के लिए मजबूर हुए हैं। इसका क्षेत्रीय प्रभाव भी है, क्योंकि वेनेजुएलाई निरंकुश शासन और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न मानवीय संकट के कारण शरणार्थी बनकर अमेरिका में बस रहे हैं। कई विद्वान तर्क दे रहे हैं कि अमेरिका का रुख उचित है क्योंकि वह आम वेनेजुएलावासियों की मदद के लिए हस्तक्षेप कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में कहा गया है कि सभी सदस्यों को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल के खतरे या उपयोग से बचना चाहिए। चूंकि यहां बल प्रयोग किया गया और अमेरिका ने इसे उचित भी ठहराया है। क्योंकि उसने बल का प्रयोग करके राष्ट्रपति मादुरो को सपत्नीक बंदी बना लिया है। इस प्रकार, यह अनुच्छेद 2(4) का स्पष्ट उल्लंघन है। दूसरा, किसी भी हस्तक्षेप के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति आवश्यक है। वह अनुमति नहीं ली गई थी। तीसरा, क्या अमेरिका को कोई तत्काल खतरा था? कोई देश किसी दूसरे देश पर केवल आत्मरक्षा में हमला कर सकता है, जब उसकी राष्ट्रीय अखंडता को खतरा हो। लेकिन वेनेजुएला से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई तत्काल खतरा नहीं था। इसलिए यह स्पष्ट रूप से आत्मरक्षा का कार्य नहीं है। इन आधारों पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि अमेरिका का रुख कानूनी रूप से उचित नहीं है।

लेकिन ट्रंप के पास इसका जवाबी तर्क है। उन्होंने कहा कि यह एक कानून प्रवर्तन अभियान है। इसके लिए भी कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है। अमेरिकी कांग्रेस की अनुमति क्यों नहीं ली गई? वेनेजुएला में हस्तक्षेप लोकतंत्र और मानवीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में तो उचित है, लेकिन वर्तमान दमनकारी रूप में नहीं, क्योंकि यह किसी भी देश की संप्रभुता को कमजोर करता है ।अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वैध नहीं है और वेनेजुएला की मौजूदा स्थिति में सुधार की गारंटी भी नहीं देता है।

तेल का खेल:

ट्रंप न कहा है कि वह वेनेजुएला की जमीन, तेल और संपत्तियों तक अमेरिकी पहुंच खोलना चाहते हैं, जिसे 1970 के दशक में वेनेजुएला द्वारा अपने तेल क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर अमेरिका से चुरा लिया गया था। उन्होंने यह भी कहा है कि वे वेनेजुएला में अवैध मादक पदार्थों के व्यापार और मानव तस्करी को निशाना बना रहे हैं क्योंकि इसका अमेरिका पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन स्थिति का गहन विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसमें एक भू-राजनीतिक पहलू भी है जिसका चीन और अमेरिका के साथ चल रहे व्यापक व्यापार युद्ध से स्पष्ट संबंध है।

सतही तौर पर देखा जाए तो यह असामान्य नहीं लगता क्योंकि अमेरिका का मादुरो पर दबाव बनाने के लिए कदम उठाने का इतिहास रहा है। लेकिन 2025 से पहले के उपाय मुख्य रूप से वित्तीय प्रतिबंधों, संपत्ति जब्ती और प्रमुख नेटवर्कों जैसे साल 2020 में रोसनेफ्ट या 2021 में तेल चोरी करने वाले जहाजों को नामित करने पर केंद्रित थे। इनका उद्देश्य व्यापक भौतिक हस्तक्षेप के बिना व्यवधान उत्पन्न करना था। हालांकि ट्रंप ने वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना बार-बार जताई थी लेकिन हालिया कार्रवाई ने ट्रंप के फ्यूचर प्लान को जग जाहिर कर दिया।

हाल ही में व्हाइट हाउस ने एक आधिकारिक बयान जारी कर ट्रंप प्रशासन की मोनरो सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि की थी। साल 1823 में हस्ताक्षरित इस सिद्धांत में कहा गया था कि अमेरिका लैटिन अमेरिका में अन्य देशों के प्रभाव को अस्वीकार करेगा। सिद्धांत के एक नए "ट्रंप क्लाज" में कहा गया है कि अमेरिकी लोग - न कि विदेशी राष्ट्र या वैश्विक संस्थाएं - हमेशा हमारे गोलार्ध में अपने भाग्य के नियंत्रक होंगे।

चीन के इस क्षेत्र में बढ़ रहे प्रभाव को देखते हुए कुछ सामरिक विश्लेषक कह रहे हैं कि अमेरिका इस क्षेत्र को चीन से सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है और यह बात समझ में भी आती है।

1999 में क्यूबा और रूस के सहयोगी वामपंथी लोकलुभावन नेता ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के बाद से अमेरिका और वेनेजुएला के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। 2013 में उनकी मृत्यु हो गई और उनके चुने हुए उत्तराधिकारी मादुरो राष्ट्रपति बने और धांधली वाले चुनावों और असहमति के दमन के आरोपों के बावजूद सत्ता में बने रहे।

दिसंबर के अंत में जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिका चाहता है कि मादुरो पद छोड़ दें तो उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे लगता है कि उनके लिए ऐसा करना बुद्धिमानी होगी।

चीन सालों से तेल के बदले ऋण सौदों के तहत वेनेजुएला को क्रेडिट लाइनें दे रहा है। मध्य पूर्व से अपनी तेल की निर्भरता को कम करने के लिए चीन का यहां से तेल लेना आवश्यक है।

आर्थिक मोर्चे पर, वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा सिद्ध पेट्रोलियम भंडार है। यह वैश्विक भंडार का लगभग 18 प्रतिशत है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसके पास सोने, दुर्लभ खनिजों और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के भी महत्वपूर्ण भंडार हैं। यहां 40 लाख टन सोने के खनिज भंडार का अनुमान है। वहीं, 60 मिलियन टन अल्यूमीनियम अयस्क (बॉक्साइट) होने का भी अनुमान लगाया गया है।

चीन के साथ अमेरिका के तनाव ने इन सभी खनिजों के अपार महत्व को स्पष्ट कर दिया है, जो रक्षा प्रणालियों और हथियारों सहित अत्याधुनिक तकनीकी विनिर्माण के लिए आवश्यक हैं। इस मामले में, विशेष रूप से प्रसंस्करण क्षमता के मामले में अमेरिका चीन से बेहद पीछे है।

वेनेजुएला में राजनीतिक हित क्या है?

मादुरो को सत्ता से हटाना ट्रंप के लिए असंतुष्ट वेनेजुएलावासियों, निकारागुआवासियों और हिस्पैनिक मतदाताओं के अन्य वर्गों का समर्थन फिर से हासिल करने का एक तरीका है। इन मतदाताओं ने अतीत में उनका उत्साहपूर्वक समर्थन किया था, लेकिन अब उनकी आर्थिक और निर्वासन नीतियों से पीछे हटने लगे हैं।

अमेरिका के नागरिक या कानूनी दर्जा प्राप्त वेनेजुएलावासियों को यह स्पष्ट रूप से पता था कि अपने देश से भागकर अमेरिका आए वेनेजुएलावासियों को निर्वासित नहीं किया जाएगा—निकारागुआवासियों और कुछ हद तक क्यूबावासियों के मामले में भी यही बात लागू होती थी। अब वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और गुस्से में हैं। ट्रंप को हिस्पैनिक मतदाताओं का समर्थन खोना पड़ रहा है। यह उनके और रिपब्लिकन पार्टी के लिए मायने रखता है। स्विंग स्टेट्स में तो इनका खूब बोलबाला है। लेकिन मादुरो के सत्ता से हटने के बाद, वेनेजुएला, निकारागुआ और अन्य समूह संभवतः ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थन में वापस आ जाएंगे, जिससे जॉर्जिया, फ्लोरिडा, न्यू जर्सी और टेक्सास जैसे क्षेत्रों में ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को उनका समर्थन और मजबूत होगा। इससे क्यूबावासियों का पारंपरिक समर्थन भी मजबूत होगा और बढ़ेगा, क्योंकि कराकस में सत्ता परिवर्तन से अंततः हवाना में भी ऐसा ही परिणाम देखने को मिल सकता है।

वेनेजुएला का वर्तमान और भविष्य?

चावेज और मादुरो के शासनकाल में वेनेजुएला की आर्थिक और राजनीतिक कहानी एक त्रासदी रही है। उनके शासन ने कभी विश्वसनीय रही चुनावी प्रणाली को भ्रष्ट कर दिया। ऊर्जा क्षेत्र को लगभग बर्बाद कर दिया और अधिकांश लोगों का जीवन दयनीय बना दिया।

वेनेजुएला में निराशा और हताशा का माहौल है। यहां गरीबी एक गंभीर समस्या है और भ्रष्टाचार बेकाबू है। इसका असर दक्षिण अमेरिका के इसके पड़ोसी देशों पर भी पड़ रहा है, जो अब वेनेजुएला के शरणार्थियों की बाढ़ का सामना कर रहे हैं।

तेल के इतने विशाल भंडार फिर भी गरीब क्यों है वेनेजुएला?

1920 के दशक से ही वेनेजुएला की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता तेल पर बढ़ती निर्भरता रही है। देश के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण 1970 के दशक में हुआ था, जो चावेज के सत्ता में आने से कई साल पहले की बात है। हालांकि, चावेज से पहले की कई सरकारों ने भी एक्सॉनमोबिल, बीपी, गल्फ और शेवरॉन जैसी बड़ी कंपनियों के साथ सेवा अनुबंध और संयुक्त उद्यम किए। इससे उन्हें आवश्यक तकनीकी सहायता मिलती रही लेकिन जब ह्यूगो चावेज सत्ता में आए तो उन्होंने राज्य की तेल कंपनी पर अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू कर दिया और अंततः विदेशी कंपनियों को बाहर कर दिया। उन्होंने एक तरह का शोषणकारी दृष्टिकोण भी अपनाया, जिसके तहत उन्होंने आवश्यक निवेश किए बिना ही इस क्षेत्र से राजस्व निचोड़ लिया। यह विनाशकारी साबित हुआ क्योंकि तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन अत्यधिक पूंजी-गहन होता है। और स्थिति को और भी बदतर बनाने के लिए, चावेज ने राज्य की तेल कंपनी से उन तकनीकी विशेषज्ञों और अनुभवी कर्मचारियों को निकाल दिया जो इसे उत्पादक बनाने का तरीका जानते थे। इसलिए चावेज के चुने हुए उत्तराधिकारी मादुरो के 2013 में सत्ता संभालने से पहले ही तेल उत्पादन का स्तर गिरने लगा था।

ट्रंप का अगला टारगेट कौन?

ग्रीनलैंड

ग्रीनलैंड की पिघलती आर्कटिक बर्फ नए लाभदायक समुद्री परिवहन मार्गों का निर्माण कर रही है। वहीं, इसका भूभाग खनिज संपदा से समृद्ध है। इसकी रणनीतिक स्थिति को नाटो के लिए एक संभावित कमजोरी के रूप में भी पहचाना गया है । रूस, चीन, अमेरिका और यूरोप पहले ही इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के लिए कदम उठा चुके हैं।

ट्रंप राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ग्रीनलैंड को आवश्यक मानते हैं। वर्ष 2019 से ही उन्होंने इसे खरीदने या अधिग्रहित करने की इच्छा जताई है। यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। इस साल उन्होंने फिर से दोहराया कि हमें ग्रीनलैंड की जरूरत है। ग्रीनलैंड की सामरिक स्थिति आर्कटिक में रूस और चीन की गतिविधियों का मुकाबला करने में महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने कहा कि यह द्वीप रूसी और चीनी जहाजों से घिरा है। इसलिए अमेरिका को इस पर नियंत्रण करना होगा। उन्होंने संकेत दिया कि इसके नियंत्रण में सैन्य बल या हाइब्रिड युद्ध का इस्तेमाल हो सकता है। इससे डेनमार्क और नाटो के साथ तनाव बढ़ रहा है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स फ्रेडरिक नीलसन ने इन धमकियों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि ट्रंप को इस क्षेत्र पर कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने ट्रंप को यह भी याद दिलाया कि डेनमार्क पहले से ही मौजूदा सुरक्षा समझौतों के माध्यम से अमेरिका, जो नाटो का एक सदस्य है, को ग्रीनलैंड तक व्यापक पहुंच प्रदान करता है। फ्रेडरिकसेन ने कहा कि इसलिए मैं अमेरिका से आग्रह करता हूं कि वह एक ऐतिहासिक रूप से करीबी सहयोगी और एक ऐसे देश और लोगों को धमकाना बंद करे जिन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे बिकने वाले नहीं हैं।

लेकिन ट्रंप ने यहां अपना विशेष दूत नियुक्त कर ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने का लक्ष्य साफ कर दिया है। ट्रंप की यह नीति मैनिफेस्ट डेस्टिनी सिद्धांत से प्रेरित है, जो 19वीं सदी में अमेरिकी विस्तार का आधार था। मैनिफेस्ट डेस्टिनी 19वीं सदी में अमेरिका में प्रचलित एक सिद्धांत था। इसके अनुसार, अमेरिका का अटलांटिक से प्रशांत महासागर तक पूरे उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप में विस्तार करना दैवीय रूप से तय है ताकि वहां लोकतंत्र, पूंजीवाद और ईसाई धर्म का प्रसार हो सके। यह एक शक्तिशाली विचार था जिसने अमेरिकी विस्तारवाद को बढ़ावा दिया, लेकिन यह वहां के मूल निवासियों के लिए विनाशकारी साबित हुआ।

क्यूबा

क्यूबा पर ट्रंप का फोकस कम्युनिस्ट शासन को खत्म करने पर है। वेनेजुएला के हमले के बाद ट्रंप ने कहा कि क्यूबा "पतन की कगार पर" है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों से जूझ रही है और मादुरो की गिरफ्तारी से क्यूबा तेल सहायता से वंचित हो जाएगा। ट्रंप ने तेल नाकाबंदी और सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी है, जिससे क्यूबा की सरकार गिर सकती है। रूस और चीन के साथ क्यूबा के बढ़ते संबंधों को ट्रंप खतरा मानते हैं, जैसे रूस का तेल और कृषि में निवेश। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने क्यूबा को वेनेजुएला का सहयोगी बताकर उस पर निशाना साधा है। यह रणनीति मोनरो डॉक्ट्रिन पर आधारित है, जो लैटिन अमेरिका में विदेशी हस्तक्षेप रोक लगाती है।

कोलंबिया

कोलंबिया को ट्रंप ने ड्रग ट्रैफिकिंग और वामपंथी नीतियों के लिए निशाना बनाया। उन्होंने राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को बीमार बताकर धमकी दी कि अगर कोलंबिया अमेरिकी हितों (जैसे ड्रग रोकथाम) का साथ न दे, तो सैन्य कार्रवाई संभव लगती है। वेनेजुएला हमले के बाद ट्रंप ने कोलंबिया पर निशाना साधते हुए उसे "अगला लक्ष्य" करार दिया। उन्होंने कहा कि पेट्रो की सरकार ने कोका उत्पादन पर नरम रुख अपनाया है, जो अमेरिका में कोकेन ओवरडोज (लगभग 30,000 मौतें सालाना) बढ़ा रहा है। ट्रंप ने क्लैन डेल गोल्फो जैसे कार्टेल को आतंकी संगठन घोषित किया है। वहीं, पेट्रो ने जवाब में कहा कि वे "हथियार उठाएंगे और अमेरिका को माकूल जवाब देंगे।

कुल मिलाकर जमा यह है कि ऐसी घटनाओं से उन देशों को साहस मिलेगा, जिनका एजेंडा अब तक अधूरा है। यूक्रेन के कई इलाकों पर अधिकार जमाने का रूस ने ऐलान किया है, जबकि चीन की मंशा 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने की है। अब अमेरिका किस मुंह से इनको रोकने के लिए आगे आएगा? पहली झलक में तो यही लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई सिर्फ यूरोप की है, मगर क्रीमिया और यूक्रेन के पूर्व में चेचन्या है। चेचन्या से कॉकेशस होते हुए हम सीरिया और पश्चिम एशिया में बहुत जल्द पहुंच जाते हैं, यानी यह एक यूरेशियाई युद्ध नजर आता है। एशिया में भी युद्ध की चिंगारियां फूट रही हैं। थाईलैंड -कंबोडिया, उत्तर कोरिया-जापान को इसमें गिना जा सकता है। कहने का मतलब साल 2026 भी वैश्विक भू राजनीति के लिहाज से उथल पुथल रहने वाला है, जिसकी शुरुआत हो चुकी है।

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