न्यायिक भ्रष्टाचार पर इतनी गहमागहमी क्यों?

भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला इस विश्वास पर टिकी है कि न्यायपालिका केवल कानूनों की व्याख्याता ही नहीं बल्कि आम आदमी के अधिकारों की रक्षक भी है। उसे संविधान का रक्षक और न्याय का अंतिम मंदिर कहा गया है। लेकिन हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी )के पाठ्यक्रम में न्यायिक भ्रष्टाचार के उल्लेख पर सुप्रीम कोर्ट का तीखा संज्ञान लेना और उसे साजिश करार देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या न्यायपालिका अपनी ही खामियों को स्वीकार करने के बजाय आलोचना के स्वर को दबाने का प्रयास कर रही है? क्या लोकतंत्र में कोई भी संस्थान पवित्र गाय (होली काऊ) हो सकता है जिस पर सवाल न उठाए जा सकें?

एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम में न्यायिक चुनौतियों को शामिल कर छात्रों को वास्तविकता से परिचित कराने का प्रयास किया था। परिषद् का उद्देश्य भावी पीढ़ी को यह बताना था कि संस्थागत ढांचे में कमियां कहां हैं। विडंबना देखिए कि जिस न्यायपालिका को अभिव्यक्ति की आजादी का प्रहरी होना चाहिए था उसने अपनी ही संस्था की आलोचना को आपराधिक साजिश और गंभीर अपराध की श्रेणी में रख दिया। संवादहीनता और सेंसरशिप किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक हैं, फिर चाहे वह न्यायपालिका के संदर्भ में ही क्यों न हो।

यहां हमें एक बुनियादी तथ्य कभी नहीं भूलना चाहिए इस देश में ऐसा शायद ही कोई होगा जो एनसीईआरटी की किताबें पढ़कर उच्च पदों पर न पहुंचा हो। खुद न्यायाधीशों से लेकर नौकरशाहों तक सबकी बौद्धिक नींव इन्हीं किताबों से तैयार हुई है। यदि छात्र और शिक्षक इन विषयों को पढ़कर अपने विचार साझा करते, तो इससे न्यायपालिका कमजोर नहीं बल्कि बेहतर होती। इससे हम एक बेहतर और पारदर्शी न्यायिक ढांचे को बनाने में मदद ही पाते। जब शिक्षा में ही सच को अपराध बता दिया जाए तो भविष्य के नेतृत्व से ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

यह प्रतिक्रिया उस मानसिकता को उजागर करती है जहां अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें सद्गुण बताकर छिपाना एक आदत बन गई है। यदि छात्र न्यायिक प्रणाली की खामियों और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में नहीं जानेंगे तो वे एक बेहतर व्यवस्था की मांग कैसे करेंगे? सच को किताबों से हटा देने का अर्थ यह नहीं कि सच का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। भारतीय न्याय व्यवस्था में एक सामान्य नागरिक के लिए न्याय तक पहुंचना किसी दुर्गम पहाड़ की चढ़ाई जैसा है। तारीख पर तारीख की संस्कृति ने आम आदमी का न्यायपालिका से मोहभंग कर दिया है। दशकों तक चलने वाली मुकदमेबाजी में लोगों की पूरी जिंदगी और संपत्ति स्वाहा हो जाती है। यह प्रक्रियागत भ्रष्टाचार है, जो वित्तीय भ्रष्टाचार से कहीं अधिक घातक है। अदालतों में करोड़ों लंबित मामले न्यायपालिका की अक्षमता और सुधार के प्रति उदासीनता का प्रमाण हैं।

भारत दुनिया का शायद एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां न्यायाधीश ही न्यायाधीशों को चुनते हैं। यह कॉलेजियम प्रणाली अपनी स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रही है। आलोचक इसे अपारदर्शी और भाई-भतीजावाद का पोषण करने वाली व्यवस्था मानते हैं। दुनिया के विकसित लोकतंत्रों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। कुछ वैश्विक उदाहरणों को यदि देखें तो पता चलता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति न्यायाधीशों को नामांकित करता है और सीनेट (विधायिका) की मंजूरी के बाद ही नियुक्ति होती है। ब्रिटेन में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायिक नियुक्ति आयोग है। इन देशों में नियुक्तियां सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होती हैं। इसके विपरीत भारत में यह प्रक्रिया बंद दरवाजों के पीछे होती है, जिसे अक्सर अंकल जज सिंड्रोम या भाई-भतीजावाद का अड्डा माना जाता है। संसद में बताए गए आंकड़े कहते हैं कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ 8,600 से अधिक भ्रष्टाचार की शिकायतें लंबित हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और स्वयं सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीश व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में इसे साजिश नहीं बल्कि सुधार की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।

न्यायपालिका को अपनी साख बचाने के लिए संस्थान के अहंकार को त्याग कर संस्थागत सुधार की राह पकड़नी होगी। इसके लिए कुछ अपरिहार्य उपाय करने होंगे। यह उपाय लंबे समय से अपेक्षित हैं जिनमें शामिल है न्यायिक नियुक्ति आयोग की बहाली। इसके अंतगर्त कॉलेजियम प्रणाली को त्यागकर एक ऐसी निष्पक्ष संस्था बनाई जाए जिसमें कार्यपालिका, न्यायपालिका और नागरिक समाज के प्रतिनिधि हों। नियुक्तियों में पारदर्शिता ही भ्रष्टाचार की पहली काट है। न्यायाधीशों के आचरण की जांच के लिए एक स्वतंत्र तंत्र होना चाहिए। इसके लिए 'न्यायिक जवाबदेही विधेयक पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सिविल सेवा की तर्ज पर न्यायाधीशों की भर्ती के लिए एक राष्ट्रीय परीक्षा हो, जिससे केवल योग्यता के आधार पर ही प्रतिभाएं तंत्र का हिस्सा बन सकें।

न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना रहे इसके लिए न्यायपालिका को अपने काम-काज के तरीके को सुधारना होगा। न्यायपालिका को चाहिए कि वह शैक्षिक विमर्श और रचनात्मक आलोचना को दबाने के बजाय उसे खुल मन से स्वीकारे। न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। इस शाश्वत सिद्धांत की कसौटी पर आज हमारी न्यायपालिका खरी नहीं उतर पा रही है।

एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम से भ्रष्टाचार का पाठ हटाना समस्या का समाधान नहीं है असली समाधान उस भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने में है। यदि न्यायपालिका खुद को सुधारने के लिए तैयार नहीं होती है, तो वह अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो देगी। लोकतंत्र में कोई भी संस्थान संविधान से ऊपर नहीं है और हमारा संविधान 'हम भारत के लोग' से शुरू होता है। अंतत: जनता की अदालत में न्यायपालिका को जवाबदेह होना ही पड़ेगा, यही लोकतांत्रिक नीति है और मर्यादा भी।

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