सही राह जरूरी

आज समूचा विश्व एक अभूतपूर्व और अत्यंत जटिल संकट के दौर से गुजर रहा है। सदी की सबसे भयानक महामारी कोरोना के दंश से वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी संभल भी नहीं पाई थी कि लगातार भड़कते युद्धों ने अंतरराष्ट्रीय ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। रूस-यूक्रेन संघर्ष के लंबे खिंचने और उसके बाद अमेरिका-ईरान के बीच छिड़ी जंग ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक संतुलन को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। यह तबाही ऐतिहासिक रूप से वर्ष 1929 की महा मंदी और वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भिन्न और कहीं अधिक घातक है।

इस भीषण संकट की आहट पाते ही दुनिया के तमाम दूरदर्शी देशों ने समय रहते सुरक्षात्मक कदम उठाए और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए ठोस नीतियां लागू कीं। परंतु एक राष्ट्र के रूप में हम इन आवश्यक उपायों को अपनाने में बहुत देर करते रहे। जब वैश्विक नेतृत्व अपनी जनता को इस संकट से उबारने के लिए दिन-रात रणनीतियां बना रहा था तब हमारे नीति-नियंता राजनीतिक प्राथमिकताओं के चक्रव्यूह में फंसे रहे, जिससे आज देश का हर वर्ग-चाहे वह दिहाड़ी मजदूर हो, छात्र हो या छोटे रेहड़ी-पटरी वाले कामगार सब इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं।

नीतिगत विफलता और आम जनमानस का संकट

इस उथल-पुथल का सबसे पहला और सीधा प्रहार देश के ऊर्जा क्षेत्र पर हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में आई भारी उछाल ने घरेलू बाजार को अस्त-व्यस्त कर दिया। देश के कोने-कोने से रसोई गैस के लिए लगी लंबी-लंबी कतारों की तस्वीरें सामने आईं। इस बेतहाशा महंगाई ने कोरोना की मार से जैसे-तैसे उबर रहे गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। महानगरों में रहने वाले प्रवासी मजदूर और छात्र एक बार फिर आर्थिक तंगहाली के कारण अपने गांवों की ओर पलायन करने पर मजबूर हो गए। इस संकट के दौरान सरकार की ओर से लगातार यह आधिकारिक दावे किए जाते रहे कि देश के पास ईंधन का पर्याप्त भंडार सुरक्षित है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के दावों के अनुसार, देश में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता पर्याप्त थी लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल जुदा थी। यदि भंडार पर्याप्त था तो जनता को आश्वस्त क्यों नहीं किया जा सका? कालाबाजारी और लंबी कतारों को समय रहते रोकने में हम विफल रहे।

सरकार और उसके विचारकों द्वारा अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि 150 करोड़ की विशाल जनसंख्या वाले देश में व्यवस्थाएं सुचारू करने में समय लगता है और हमारी तुलना किसी छोटे देश से नहीं की जा सकती। यह तर्क पूरी तरह से बचकाना और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने का प्रयास प्रतीत होता है। एक लोकतांत्रिक और जिम्मेदार सरकार का यह प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए था कि वह अपनी नीतियों और पूर्व-तैयारियों का स्तर ऐसा रखती जिससे वैश्विक संकट का प्रभाव हमारे नागरिकों पर न्यूनतम पड़ता।

सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि जब देश के सामने एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक संकट मुंह बाए खड़ा था तब देश का शीर्ष नेतृत्व और पूरी प्रशासनिक मशीनरी राज्यों के विधानसभा चुनावों में व्यस्त थी। रैलियों, भाषणों और वोट बैंक के गणित में उलझे रहने के कारण आसन्न संकट को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। जब चुनाव संपन्न हो गए तब जाकर नीति-नियंताओं को देश की गिरती आर्थिक स्थिति की याद आई। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीतियों पर तात्कालिक चुनावी राजनीति हमेशा हावी रही है।

जंग की आड़ में मुनाफाखोरी

इस वैश्विक संकट के दौर में जहां आम जनता पिस रही है तो वहीं कुछ देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इस आपदा को एक बड़े आर्थिक अवसर में बदला है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के आधिकारिक आंकड़े गवाही देते हैं कि जंग की आहट और भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा वित्तीय लाभ पश्चिमी देशों की रक्षा और ऊर्जा कंपनियों को मिला है। दुनिया की शीर्ष 100 रक्षा कंपनियों ने युद्ध की विभीषिका के बीच 679 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक राजस्व कमाया है। इसके साथ ही अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई कृत्रिम उछाल का फायदा उठाकर बड़ी तेल कंपनियों ने अप्रत्याशित मुनाफा बटोरा है। अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों जैसे एक्सॉनमोबिल और शेवरॉन ने क्रमशः 85.14 अरब डॉलर और 48.61 अरब डॉलर का तिमाही राजस्व दर्ज कर इतिहास रचा है। दुनिया के बड़े खिलाड़ी युद्ध से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, जबकि भारत जैसे विकासशील देश ईंधन के महंगे आयात के कारण भारी घाटा उठा रहे हैं।

प्रधानमंत्री की विरोधाभासी टिप्पणियां

इस आर्थिक आपातकाल के दौरान देश के शीर्ष नेतृत्व की ओर से आए बयानों ने जनता में आश्वस्ति के बजाय उनकी चिंता को और बढ़ा दिया। प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से यह कहना कि देश गहरे संकट में है इसलिए नागरिक कम से कम एक साल तक सोना न खरीदें बेहद चौंकाने वाला और विरोधाभासी था। यह टिप्पणी न केवल भारतीय समाज की सांस्कृतिक और आर्थिक सोच (जहां सोने को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है) के विपरीत थी बल्कि इसने वैश्विक स्तर पर भी देश की वित्तीय साख को लेकर नकारात्मक संदेश भेजा। क्या इस संकट की घड़ी में दुनिया के किसी अन्य संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री ने अपने नागरिकों से इस प्रकार की लाचारी भरी टिप्पणी की थी? वैश्विक वित्तीय संकटों का अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऐसे बयानों से बाजार में घबराहट फैलती है, जिससे विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालने लगते हैं।

विदेश नीति का भटकाव

अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद भारत की पारंपरिक रूप से संतुलित रहने वाली विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े हुए। ईरान के शीर्ष नेता अली खामेनेई की हत्या के बाद भारत सरकार द्वारा अत्यंत विलंब से और औपचारिक शोक संवेदना व्यक्त की गई। इस कूटनीतिक देरी ने वैश्विक मंच पर यह संदेश दिया कि भारत अब अपने स्वतंत्र कूटनीतिक रुख को छोड़कर पूरी तरह से अमेरिकी खेमे की ओर झुक चुका है। हालांकि, विपक्ष और घरेलू आलोचनाओं के बाद भारत सरकार ने स्थिति को संभालते हुए 5 मार्च 2026 को आधिकारिक शोक व्यक्त किया। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास का दौरा किया और दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की याद में रखी गई शोक पुस्तिका में भारत सरकार की ओर से संवेदनाएं दर्ज कीं। ऐतिहासिक रूप से भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने, सांस्कृतिक और सौहार्दपूर्ण रहे हैं। सामरिक दृष्टिकोण से चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आपूर्ति के लिए ईरान हमेशा से भारत का एक विश्वसनीय साझेदार रहा है। इस युद्ध के दौरान जब अमेरिका के पारंपरिक और पुराने सहयोगियों ने भी उसके आक्रामक रुख को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए थे तब भारत अमेरिकी पक्ष में खड़ा दिखाई दिया। भारत हमेशा से ग्लोबल साउथ के देशों की आवाज रहा है। हम गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेतृत्वकर्ता रहे हैं। हमारी छवि एक मजबूत, स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की रही है जो सही को सही और गलत को गलत कहने का माद्दा रखता है। हालिया कूटनीतिक भटकाव के कारण हमारी उस रणनीतिक स्वायत्तता को गहरी ठेस पहुंची है, जिसे बनाने में दशकों का समय लगा था।

लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था एवं रुपये की ऐतिहासिक गिरावट

आर्थिक मोर्चे पर हम लंबे समय से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने और वर्ष 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का दावा ठोकते आ रहे थे। परंतु, वर्तमान वित्तीय आंकड़े इन दावों की कलई खोलते हैं। हाल ही में आई एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में तरलता बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को कृत्रिम मजबूती देने के लिए अपने आरक्षित भंडार से लगभग 12 अरब डॉलर का सोना बेचना पड़ा है। हालांकि, आरबीआई और केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि बैंक का कुल भौतिक स्वर्ण भंडार 880.52 मीट्रिक टन पर पूरी तरह स्थिर है और इसमें कोई कमी नहीं आई है। इसके बाबजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात क्षेत्र भारी दबाव में हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा बाहर खींच रहे हैं। इसके कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले और चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। रुपया गिरने से हमारा आयात लगातार महंगा हो रहा है और चालू खाता घाटा बढ़ता जा रहा है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा और अधिक डगमगा गया है। हम लक्ष्य से लगातार दूर होते जा रहे हैं और देश में आर्थिक मंदी तथा बेरोजगारी का संकट गहराता जा रहा है।

तकनीक और एआई की दौड़ में पिछड़े

जिस समय दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं भविष्य की तकनीकों पर दांव लगा रही थीं, हम पारंपरिक उद्योगों और राजनीतिक बहसों में उलझे रहे। आज सिंगापुर और ताइवान जैसे छोटे देश दुनिया की शीर्ष और सबसे प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो चुके हैं। उनके इस उत्थान का मुख्य कारण एडवांस कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में उनका दूरदर्शी और भारी निवेश है। काउंटरपॉइंट रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रशासन (आईटीए) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ताइवान दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक सेमीकंडक्टर फाउंड्री राजस्व को नियंत्रित करता है और अत्याधुनिक 3-नैनोमीटर व 5-नैनोमीटर जैसी प्रणालियों के उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी अधिक है। अकेले ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग ने 165 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक राजस्व अर्जित किया है, जो उसकी कुल जीडीपी का लगभग 20.7 प्रतिशत है। एआई जीपीयू और एक्सेलेरेटर्स की वैश्विक मांग के चलते ताइवान की प्रमुख कंपनी टीएसएमसी ने वैश्विक फाउंड्री बाजार के 72 प्रतिशत हिस्से पर अपना एकाधिकार जमा लिया है। ताइवान और सिंगापुर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुसंधान और हार्डवेयर निर्माण को अपनी राष्ट्रीय नीति का मुख्य हिस्सा बनाया है। इसके विपरीत, भारत केवल सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात तक सीमित रहा और हार्डवेयर, घरेलू चिप निर्माण तथा उन्नत एआई अनुसंधान के बुनियादी ढांचे में इन देशों से बहुत पीछे छूट गया। इसके साथ ही हमारी क्षेत्रीय कूटनीति और पड़ोसी पहले की नीति भी विफल होती दिखाई दे रही है। सीमा विवादों और आंतरिक राजनीति के कारण नेपाल लगातार भारत को आंखें दिखा रहा है और चीन के प्रभाव में जा रहा है। हमारा पारंपरिक मित्र देश बांग्लादेश भी अब विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों और जल बंटवारे को लेकर भारत पर नित नए आरोप लगा रहा है। चीन और पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध तो जगजाहिर हैं ही, जहां दोनों मोर्चों पर सामरिक तनाव और घुसपैठ की घटनाएं लगातार बनी हुई हैं। इन सबसे इतर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के राजनीतिक नेतृत्व का सम्मान भी कम होता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों द्वारा समय-समय पर हमारे नेतृत्व को लेकर की जाने वाली अमर्यादित टिप्पणियां इसका उदाहरण हैं। विडंबना यह है कि इस पूरे कालक्रम में हमारा धुर विरोधी पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका का खास सहयोगी बनता जा रहा है। हमारे विदेश मंत्री द्वारा वैश्विक मंचों पर देशों के बीच किसी मुद्दे के समाधान के लिए आपसी कूटनीतिक बातचीत को दलाली करार देना हमारी भाषा और कूटनीति के गिरते स्तर को दर्शाता है। एक राष्ट्र के तौर पर यह सोचने का विषय है कि आखिर हम इस आक्रामक और अमर्यादित रवैये से क्या हासिल कर रहे हैं?

आंतरिक राजनीति और सामाजिक ताना-बाना

देश की आंतरिक राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। केवल सत्ता हथियाने और वोट बैंक को सुरक्षित रखने की राजनीति देश के भविष्य और युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है। देश की सबसे प्रतिष्ठित और बड़ी परीक्षाएं आयोजित करने वाली संस्थाएं जैसे- केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा कराई जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) पूरी तरह से विवादों के घेरे में हैं। इन परीक्षाओं में पारदर्शिता का घोर अभाव दिख रहा है। पेपर लीक होना, मूल्यांकन में धांधली और भ्रष्टाचार के मामलों ने देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। जो संस्थाएं देश के भविष्य का निर्माण करने वाली थीं, वे स्वयं राजनीति और अयोग्यता का शिकार हो चुकी हैं। इसके अलावा देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत दयनीय है। अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं। यदि वे कभी पकड़े भी जाते हैं और उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हो भी जाता है, तो हमारी सुस्त न्यायिक प्रक्रिया के कारण उन्हें क्या सजा मिलती है यह आम जनता को कभी पता ही नहीं चल पाता। स्थिति यह हो चुकी है कि कई मामलों में अपराध और अपराधी के बीच का अंतर ही समाप्त हो गया है। वर्तमान सरकार और उसकी पूरी राजनीतिक मशीनरी विकास, रोजगार और आसन्न आर्थिक संकट पर चर्चा करने के बजाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति में पूरी तरह व्यस्त है। मंदिर बनाम मस्जिद के विवादों को हवा देकर बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाया जा रहा है। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता और समर्थक भी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय इन्हीं धार्मिक बहसों में उलझकर खुश हैं। इस समय जब पूरी दुनिया एक गहरी और लंबी आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ी है, तब हमारे देश की मुख्यधारा की बहस से यह मुद्दा पूरी तरह गायब है। न तो संसद में इस पर कोई गंभीर चर्चा हो रही है और न ही सरकार के पास इससे निपटने का कोई स्पष्ट नीतिगत रोडमैप या समाधान विमर्श नजर आ रहा है।

राह मुश्किल जरूर लेकिन संभव है...

विशेषज्ञों का कहना है कि इस वैश्विक और आंतरिक संकट के दौर में हमें राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर एक ठोस, दीर्घकालिक और व्यावहारिक रणनीति अपनानी चाहिए। किसी एक वैश्विक खेमे की ओर पूरी तरह झुकने के बजाय हमें अपनी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहना चाहिए। ईरान जैसे सदियों पुराने मित्रों के साथ ऐतिहासिक संबंधों को आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर संतुलित रखना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है। हमें केवल पारंपरिक सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय ताइवान और सिंगापुर की तर्ज पर एडवांस कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के घरेलू हार्डवेयर बुनियादी ढांचे में युद्धस्तर पर निवेश करना चाहिए। आंतरिक मोर्चे पर सीबीएसई और नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा प्रणालियों में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित कर युवाओं का भरोसा बहाल करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दरकिनार कर संसद से लेकर सड़क तक देश की गिरती जीडीपी, रुपये के अवमूल्यन और आसन्न वैश्विक मंदी से निपटने के उपायों पर एक गंभीर समाधान विमर्श शुरू किया जाना चाहिए। एक सभ्य, जागरूक और शांतिप्रिय नागरिक होने के नाते देश की वर्तमान राजनीति और गिरती सामाजिक मर्यादाएं अत्यधिक विचलित और चिंतित करती हैं। आज देश में जो कुछ भी सत्ता और तुष्टीकरण के नाम पर हो रहा है वह ठीक नहीं है। यदि हम आज भी नहीं संभले, अपनी नीतियों में सुधार नहीं किया और बुनियादी मुद्दों एवं वैज्ञानिक चेतना की ओर नहीं लौटे तो इस अदूरदर्शिता और राजनीतिक स्वार्थ का एक अत्यंत भयानक परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।

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