
भारत अक्सर अपनी युवा आबादी और जनसांख्यिकीय लाभांश के गौरव गान में इतना मग्न रहता है कि वह देश के भीतर चुपचाप करवट ले रहे एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव को अनदेखा कर देता है। वैश्विक मंचों पर हम इस बात की खूब मिसालें देते हैं कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, जिसके पास भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक विशाल कार्यबल है लेकिन यह स्थिति हमेशा समान नहीं रहने वाली है। वर्तमान में भारत की कुल आबादी में वरिष्ठ नागरिकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से अधिक है, जिसके साल 2050 तक लगभग दोगुनी होकर 19.5 प्रतिशत होने का अनुमान है। यानी, जब तक आज का युवा परिपक्व होगा, तब तक भारत के सामने बुजुर्गों की एक विशाल आबादी की जिम्मेदारी होगी।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था कि किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने सबसे कमजोर और बुजुर्ग नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। इस नैतिक कसौटी के बीच केरल सरकार का वर्ष 2026-27 का बजट एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप के रूप में उभरा है। केरल ने देश का पहला समर्पित बुजुर्ग कल्याण विभाग स्थापित करने का निर्णय लिया है। यह केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं है, बल्कि देश की सोच में एक बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत है। यह कदम बुजुर्गों को राज्य पर एक निष्क्रिय कल्याणकारी बोझ के रूप में देखने के बजाय उन्हें एक जीवंत और सक्रिय सिल्वर इकोनॉमी यानी वरिष्ठ नागरिकों पर आधारित अर्थव्यवस्था के स्तंभ के रूप में स्थापित करता है
केरल का यह नया नीतिगत ढांचा मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिका है। पहला स्वतंत्र जीवन को बढ़ावा। इसके तहत बुजुर्गों के लिए समर्पित पार्क, फिटनेस सेंटर और डे-केयर सेंटर बनाए जा रहे हैं ताकि वे बिना किसी पर निर्भर रहे एक स्वस्थ जीवन जी सकें। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक्टिव एजिंग सिद्धांत के अनुसार, बुजुर्गों को मानसिक और शारीरिक रूप से व्यस्त रखना उनके स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च को कम करता है। दूसरा सिल्वर इकोनॉमी का लाभ। बुजुर्गों के पास दशकों का अनुभव, ज्ञान और व्यावसायिक विशेषज्ञता होती है। केरल सरकार उद्यमशीलता और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से इस अनुभव को देश के आर्थिक विकास में दोबारा इस्तेमाल करना चाहती है। तीसरा है डेटा-संचालित योजना। इससे राज्य सरकार भविष्य के कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए एक सटीक रोडमैप तैयार करने के उद्देश्य से वरिष्ठ नागरिकों का एक व्यापक राज्यव्यापी सर्वेक्षण (सर्वे) कराने जा रही है।
केरल सरकार के इस नीतिगत बदलाव को लॉन्गिट्यूशिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया (एलएएसआई) के आंकड़े और भी स्पष्ट करते हैं। ये आंकड़े हमारे देश की व्यवस्थागत कमियों का एक भयावह खाका खींचते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 75 प्रतिशत बुजुर्ग किसी न किसी गंभीर (क्रॉनिक) बीमारी से पीड़ित हैं। 70 फीसदी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं और एक चौंकाने वाला सच यह भी है कि 78 प्रतिशत बुजुर्गों के पास जीवनयापन के लिए कोई पेंशन योजना नहीं है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी बुजुर्ग होती आबादी के लिए बहुत पहले ही सिल्वर नीतियों पर काम शुरू कर दिया था। भारत को भी अब देर किए बिना राष्ट्रीय स्तर पर इस मॉडल को अपनाने की जरूरत है क्योंकि बुढ़ापा कोई समस्या नहीं, बल्कि जीवन का एक अपरिहार्य सच है, जिससे हर किसी को गुजरना ही है।
केरल का यह प्रयोग देश के बाकी राज्यों को भी दिशा दिखाने वाला है। केरल इस समय लगभग 5.07 लाख करोड़ रुपये के भारी कर्ज के बोझ से दबा है और उसकी राजस्व आय का 77 फीसदी हिस्सा केवल वेतन और पेंशन जैसे खर्च में जाता है। इसके बावजूद यदि वित्तीय तंगहाली से जूझ रहा कोई राज्य बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन के लिए एक समर्पित विभाग की नींव रख सकता है तो देश का कोई भी अन्य राज्य अब संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर अपनी बुजुर्ग होती आबादी की अनदेखी नहीं कर सकता। जिस पीढ़ी ने अपनी जवानी और खून-पसीने से आधुनिक भारत की नींव रखी, बुढ़ापे में उसे बेसहारा छोड़ देना एक लोक-कल्याणकारी राष्ट्र के विचार की हार होगी। भारत को अपनी युवा शक्ति पर गर्व जरूर करना चाहिए लेकिन उसे अपनी बुजुर्ग होती पीढ़ी को भी एक सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य देने का कौशल सीखना होगा। केरल ने राह दिखा दी है और अब बारी बाकी देश की है।
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